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धान की खेती कैसे करें-उन्नत किस्मों की पूरी जानकारी

धान की खेती पूरे विश्व में बहुतायत बोई जाने वाली फसलें है। विश्व का संपूर्ण योगदान में भारत का द्वितीय स्थान है। धान की खेती विश्व के समुचित स्थानों पर की जाती है। जिसमें भारत द्वितीय स्थान पर है ।

धान में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुतायत पाई जाती है। यह आहार के रूप में ली जाने वाली फसल है ।जो मक्का, मूंगफली, गन्ने के बाद सबसे ज्यादा बोई जाने वाली फसल है। आहार की आधी भाग के रूप में चावल का ग्रहण सभी मनुष्य के द्वारा किया जाता है। अतः आहार के रूप में ली जाने वाली यह फसल मुख्य योगदान देती है।


भारत में धान की खेती

भारत में धान की खेती अधिकांश क्षेत्रों में की जाती है। भारत में धान की खेती में विभिन्न राज्य अग्रणी है। जिसमें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश ,हरियाणा, पंजाब ,उत्तर प्रदेश ,बिहार ,झारखंड इत्यादि राज्य हैं।

इनके अलावा भी भारत के सभी राज्यों के हिस्सों में धान की खेती को प्रोत्साहन मिलता है। धान की खेती भारत में सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ राज्य में की जाती है ।जिसके कारण छत्तीसगढ़ राज्य को “धान का कटोरा” नाम से भी संबोधित किया जाता है।

छत्तीसगढ़ में सभी क्षेत्रों में अधिकांशत धान की खेती की जाती है ।वहां पर लोग सबसे ज्यादा चावल खाना पसंद करते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में गन्ने की खेती, मक्का की खेती के बाद सबसे ज्यादा फसल उगाई जाती है, वह धान की फसल है। जो भारत में मक्का और गन्ने के बाद बोई जाने वाली सबसे अधिकांश फसलों में से एक है।

भारत में संपूर्ण विश्व कालगभगआधाभाग धान की खेतीके लिए है। जो भारत में धान की खेती को प्रोत्साहन के लिए माना गया है। क्योंकि यहां पर चावल पसंद करने वाली तथा आहार के रूप में चावल खाने वाले मनुष्य की संख्या सर्वाधिक है।

यहां पर सभी दाल सब्जी इत्यादि के साथ चावल लेना पसंद करते हैं। यही एक बड़ी वजह है कि यहां पर धान की खेती बहुतायत रूप में की जाती है।

चावल कार्बोहाइड्रेट का अच्छा संचायक है। तथा यह हमारे शरीर में आवश्यक तत्वों की पूर्ति करता है। अतः चावल को आहार के रूप में लेना अच्छा माना गया है। इसे हार के रूप में लेने से इसका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।

तथा यह फसल बारिश वाले क्षेत्रों में बारिश ना होने वाले क्षेत्रों में दोनों में वही जा सकती है। बारिश वाले क्षेत्रों में हम सीधी बुवाई के माध्यम से खेती कर सकते हैं ।वहीं जहां वर्षा कम होती है या जहां पानी कम था पाई जाती है। वहां सुस्क सीधी बुवाई के द्वारा खेती की जाती है। अतः यह कम लागत में कम समय में अधिक मुनाफा देने वाली फसल है। इसीलिए सभी किसान धान की खेती को मुनाफा की दृष्टि में देखकर बहुतायत रूप से उगाते हैं।

धान की खेती कैसे करें ?

धान की खेती का उचित समय आ गया है ।धान की खेती का उचित समय मई-जून का है। जो अभी चल रहा है। धान की खेती के लिए पानी की उचित व्यवस्था होना अत्यावश्यक है। अतः मानसून के शुरू होने से पहले ही धान की बुवाई या रोपाई शुरू कर दी जाती है।

धान की फसल की पैदावार अच्छी हो इसके लिए पानी की समुचित व्यवस्था होना अति आवश्यक है। क्योंकि धान की खेती में धान की जड़े पानी का शोषण अत्यधिक रूप से करती है। इससे जुड़े और अधिक चरणों के बारे में हम समुचित जानकारी लेंगे अतः लेख के आखिर तक बने रहे।

धान की खेती से संबंधित विशेष चरणों से वह कर हमें जाना होता है। अतः इन्हें ध्यान से पढ़ें।

भूमि की तैयारी

धान की खेती के लिए सर्वप्रथम भूमि की तैयारी आवश्यक होती है। भूमि की तैयारी के लिए हमें ट्रैक्टर के माध्यम से अपने खेतों की जुताई कराना आवश्यक होता है। जो करवाने के बाद हमें कल्टीवेटर के माध्यम से अपनी भूमि की मिट्टी को उलट पलट कर देना चाहिए। ताकि मिट्टी मेंउपस्थित पोषक तत्व है। वह आपस में मिल जाए।

इसके पश्चात जुताई के बाद हमें खरपतवार नाशी का विशेष रूप से प्रावधान करना चाहिए। मिट्टी में डीकम्पोस्ट की गई खाद की एक परत चढ़ा देना चाहिए। उसके पश्चात बीजों की बुवाई करना आरंभ करना चाहिए।धान की खेती में भूमि की तैयारी के लिए सबसे आवश्यक भूमि को समतल करना होता है। अतः हमें भूमि को समतल कर लेना चाहिए।

मृदा एवं जलवायु

धान की खेती में मृदा एवं जल वायु द्वितीय चरण है। जिसकी विषय में समुचित जानकारी होना किसान के लिए आवश्यक है। धान की खेती के लिए बारिश होना होना अति आवश्यक है। क्योंकि धान की खेती के लिए मिट्टी में नमी बने रहना अति आवश्यक होता है।

धान की खेती के लिए काली मिट्टी ,भुरी मिट्टी ,चिकनी मिट्टी, दोमट मिट्टी हर प्रकार की मिट्टी आवश्यक को स्थान रखती है। क्योंकि धान की खेती भारत देश के विभिन्न स्थानों पर की जाती है। जहां पर मृदा की अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती है। तथा उन सभी स्थानों पर धान की खेती अच्छी होती है।

अतः किसी भी मिट्टी में धान की खेती की फसल अच्छी प्राप्त होती है ।धान की खेती में मृदा का पीएच मान 5.5 से 6.5 अनुकूल माना गया है।

धान की खेती के लिए तापमान 27 डिग्री सेंटीग्रेड से 31 डिग्री सेंटीग्रेड होना अनुकूल होता है। धान की खेती के लिए समशीतोष्ण वातावरण लाभदाई होता है ।सबसे आवश्यक मिट्टी में नमी बने रहना है।

पानी की व्यवस्था

धान की खेती के लिए पानी की व्यवस्था अति आवश्यक चरणोंमेंसे एक है। सर्वप्रथम हमें हमारे खेतों में पानी की व्यवस्था समुचित करनी चाहिए। क्योंकि धान की दो विधियां होती हैं जिसमें एक विधि में खेतों में जब तक पानी भरा ना हो तब तक धान की खेती करना असंभव होता है ।

अतः पानी की समुचित व्यवस्था होना धान की खेती के लिए अति आवश्यक है। जल की उचित व्यवस्था ना होने से यह हमारी उत्पादन क्षमता पर प्रभाव डालती है ।अतः धान की खेती के लिए ऐसे स्थानों का चयन करना चाहिए जहां पानी का भराव हो सके।

पानी भरने वाले क्षेत्रों में धान की बुवाई करने से अत्यधिक उत्पादन क्षमता मेंधान प्राप्त होती है। जिससे हमारे लागत मूल्य में वृद्धि होती है ।

पानी की व्यवस्थाउचितहोना चाहिए।इसका सबसे बड़ा कारण यही है किजब धान की बुआई करना प्रारंभ करनेसे पहले ही हमेंखेत में पानीभरनाहोता है।

क्योंकि धान की खेती के लिए पानी की उचित व्यवस्था होना अत्यावश्यक है। हमारे सभी उपकरण बोर इत्यादि का पानी भी धान की खेती के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसीलिए बारिश के समय में धान की खेती की जाती है। जिससे पानी की कोई कमी ना आए।

इसकी जड़ों में जल धारण क्षमता भी बहुत अधिक होती है। यह पानी को बहुत जल्दी संधारित कर लेती है। अतः पानी की उचित व्यवस्था हमारी खेती को अत्यधिक प्रभावित कर सकती है।

अतः हमें हमारे खेतों में पानी की उत्तम व्यवस्था करनी चाहिए। हमें पौधों की रोपाई के 10 दिन बाद ही पानी की व्यवस्था कर देनी चाहिए। 1 महीने के अंदर तीन से चार पानी की आवश्यकता होती है।

बारिश के समय, समय समय पर धान में पानी मिलता रहता है। अतः पानी की कमी होने पर हमें अपने पास उपलब्ध संसाधनों की माध्यम से अपनी फसलों को पानी देते रहना चाहिए।

खाद उर्वरक एवं खरपतवार नासी

किसी भी फसल की अच्छी पैदावार के लिए खाद उर्वरक एवं खरपतवार नाशी विशेष भूमिका का निर्वाहन करते हैं।

धान की खेती के लिए भी हमें विशेष खाद की आवश्यकता होती है। हमें गोबर की डी कंपोस्ट की गई खाद रोपाई के पहले ही आधी इंच की परत के साथ संपूर्ण खेत में देनी चाहिए।

इसी के साथ जब हम बीज को रोपित कर देते हैं उसके पश्चात भी हमें गोबर की डी कंपोस्ट की गई खाद की एक बार और परतचढ़ा कर अच्छी तरह मिला देना चाहिए।

इसी के साथ हमें डीएपी 50 किलोग्राम प्रति एकड़ तथा जिंक सल्फेट15 से 16 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से तथा पोटाश 30 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से मिलाकर पूरे खेत में छिड़काव करना चाहिए।

यूरिया के स्थान पर हम सिंगल सुपर फास्फेट 5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से दे सकते हैं। इसे हम चार भागों में बांट लेते है ।तथा धान की रोपाई के 1 हफ्ते के अंदर ही इससे अपने खेत में छिड़काव कर देते हैं।

2.5 से 3 बैग यूरिया का छिड़काव में हमारे खेत में करना आवश्यक होता है। फास्फोरस लौह तत्व है जो धान की खेती के लिए आवश्यक होता है। अतः हमें हमारे खेतों में फास्फोरस की कमी नहीं होने देना चाहिए।

गेहूं की खेती खेती कि उन्हें ऐसे उर्वरक प्रदान करती है। जिसमें फास्फोरस की मात्रा होती है। मिट्टी के पीएच मान के हिसाब से ही हमें की उचित मात्रा देनी चाहिए।

आज वर्तमान समय में धान की खेती की जाती है क्योंकि गेहूं की खेती के समय संपूर्ण फास्फोरसका उपयोग कर लिया जाता है। इसी के साथ कुछ खरपतवार नासी के विषय में जानकारी हिंदुओं के साथ दी जा रही है।

1. रोपाई के बादpretilachlor 50% E.C.

2. Blaud- pretilachlor पानी से भरे खेत में 500ml प्रति एकड़ की दर से डाल देना चाहिए। 4 से 5 दिन में यह पूरे खेत में फेल कर खरपतवार की काई की परत बना देता है।

3. Erase- pretilachlor 50% EC herbicide 500 ml प्रति एइस प्रकार इन खरपतवार नासी उर्वरक और खाद की सहायता से हम धान की खेती में वृद्धि कर सकते हैं ।तथा उसके उत्पादन क्षमता को कोई प्रभाव न पड़े इसके लिए इन सभी दवाओं की खादों की समुचित व्यवस्था करनी होती है। संतुलित पैमाने पर ही हमें इन सभी की रोपाई के बाद खेतों में डाल देना चाहिए।

4. Topstar 22.5 g 80% WP 45 per acre 2 लीटर पानी में घोल बनाकर संपूर्ण खेत में डलवा देना चाहिए। 3 से 4 दिन के पश्चात खरपतवार की परत के रूप में बाहर आ जाती है।

5. मशेटीherbiside1 लीटर प्रति एकड़ की दर से रोपाई के बाद 72 घंटे के अंदर खेत में डाल देना चाहिए। इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।

6. Rifit plus pretilachlor 37% aw herbicide 600ml per acre की दर से पानी में घोलकर फैला देना चाहिए। तथा 2 दिन पानी लगाने के पश्चात हम पाते हैं कि खरपतवार की यह काई की परतबना देता है। यह सबसे ज्यादा अच्छा बिकने वाला खरपतवार नाशी है। जिसका प्रयोग अधिक पैमाने पर किया जाता है।

इस प्रकार इन खरपतवार नासी उर्वरक और खाद की सहायता से हम धान की खेती में वृद्धि कर सकते हैं। तथा उसके उत्पादन क्षमता को कोई प्रभाव न पड़े। इसके लिए इन सभी दवाओं की खादों की समुचित व्यवस्था करनी होती है। संतुलित पैमाने पर ही हमें इन सभी का अपने खेतों में छिड़काव करना चाहिए।

धान की खेती के लिए उत्तम नस्लें

धान की खेती के लिए हम परंपरागत विधि या प्राचीनतम विधि का प्रयोग करके फसल उत्पादन करते हैं। इसके लिए हमें अच्छी नस्लों का चयन करना होता है। हम चाहे तो पिछली बार का बीज जो हमें अपनी फसल के द्वारा प्राप्त हुआ है। उसका प्रयोग भी कर सकते हैं। लेकिन उसमें बीज उपचार की आवश्यकता होती है।

बाजार में उपलब्ध के बीज के द्वारा अपनी बुवाई करें तो बेहतर होता है। इसी के लिए जानकारी देने के लिए आपको मोटे बीज तथा पतले बीज और कुछ बासमती नस्लों के विषय में आपको बताएंगे। जिससे हमें कम समय में अधिक पैदावार प्राप्त होती है। तथा भारत के बहुत सारे क्षेत्रों में इन सभी प्रश्नों का प्रयोग किया जा रहा है।

सर्वप्रथम हम मोटे दाने वाली नस्लों की बात करेंगे जिसमें कुछ नस्लें निम्न प्रकार स्पष्ट है।

1. Poineer की 28 p 67 – धान की खेती की जेनस में छत्तीसगढ़ में किसानों को किसानों के द्वारा अत्यधिक मात्रा में बोली जाने वाली नस्लें है।

इसकी सबसे अच्छी विशेषता यह है। कि इससे संबंधित फसलों में रोग नहीं होता। तथा उसकी बाली गिरती नहीं है। उसके दानों में चमक होती है। दाने बहुत भारी मात्रा में पाए जाते हैं। तथा इनके पौधों में जो कल्ले होते हैं वह बहुत अधिक संख्या में फूटते हैं। जिससे बालियों की संख्या में भी वृद्धि होती है।

तथा हमें अत्यधिक अच्छी मात्रा में उत्पादन प्राप्त होता है।धान की यह नस्लें 130 से 135 दिन के अंदर पकड़ कर तैयार हो जाती है। तथा 30 से 35 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से यह हमें उत्पादन प्राप्त कराती है। 100 से 110 प्रति किलो की दर से बीज हमें बाजार में उपलब्ध हो जाता है। तथा यह कम समय में तथा अधिक उपज देने वाली सबसे अच्छी नस्ल है।

2. Signet 5050- धानकीनस्लोंमें बहुत अच्छी पैदावार देने वाली नस्लें है। यह भी छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में बोई जाती है। सिगनेट की बहुत सारी नस्ले जो धान की खेती के लिए प्रचलित है। इसके माध्यम से जो पौधे आरोपित होते हैं।

उसमें रोगों की कोई भी परेशानी नहीं होती। तथा इसका तना मजबूत होता है। जिससे किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति में यह जमीन से उखड़ता नहीं है। तथा अध्यारोपित करने के पश्चात इसे जमीन से उखाड़ना इतना आसान नहीं होता। यह लगभग 1३० दिन में तैयार हो जाती है। 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें उत्पादन क्षमता प्रदान करती है। यह धान की उन्नत नस्ल में से एक है।

3. बायर की6444 gold-मोटे धान आवश्यक नस्ले है। जो मध्यम ऊंचाई की होती है। तथा इसमें पौधे की औसत ऊंचाई लगभग 110 सेंटीमीटर की होती है। इसमें कल्ले बहुत अच्छी फूटते हैं।यह 130 से 135 दिन के अंदर पक कर तैयार हो जाती है। तथा 30 से 35 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें उत्पादन प्रदान करती है।

4. Loknath 505 – यह धान की उन्नत नस्ल में से एक है। जो लगभग 130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। यह भी मध्यम ऊंचाई की होती है। जिससे पौधे की लंबाई लगभग 100 सेंटीमीटर होती है। इसमें कल्लों की संख्या बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती हैं। जिससे जल संधारण क्षमता भी बहुत ज्यादा होती है।

इससे जोदाने होते हैं वह बहुत वजनदार होते हैं। दिखने में छोटे छोटे दाने होते हैं। परंतु खाने में बहुत स्वादिष्ट होते हैं। इसीलिए बाजार में उसकी डिमांड बहुत अच्छी होती है। 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से यह हमें उत्पादन क्षमता देतीहै।

5. Us 362-। यहधानकीमोटे दानों की नसों में से एक है। जिसमें जोपोधा प्राप्त होता है 105 से ११० सेंटीमीटर औसत ऊंचाई का पौधा में प्राप्त होता है। 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें यह प्रजनन क्षमता देती है।

इसकी दानों में खाने का स्वाद बहुत ही अच्छा होता है ।तथा यह 130 दिन के अंदर पक कर तैयार हो जाती है।इनमें कल्लो की संख्या अधिक होती है। लगभग 50 की संख्या में कल्ले फूटते हैं। जिसमें बालियों की क्षमता भी बहुत अधिक होती है। इसकादाना मोटा होता है। तथा इसका पौधा रोग रहित होता है।इस नस्ल को बहुतायत रूप में पसंद किया जा रहा है।

6. 27 p37 poineer- पॉयनियरकी यहनस्ल ही धान की खेती के लिए अत्यधिकउपयोगी है। जो १27 से 135 दिन के अंदर यह पक कर तैयार हो जाती है। तथा इसका पोधा मध्यम ऊंचाई लगभग 105 से 110 सेंटीमीटर का होता है।इसकेदाने खाने में स्वाद बहुत ही होता है। भले ही यह मोटे दानों वाली नस्ल है। 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से यह हमें पैदावार प्रदान करती है।

7. कावेरी468- पॉपुलर धान की वैरायटी में से एक है। इस किस्म की धान में हल्की मिट्टी एवं कम पानी में ज्यादा उत्पादन प्राप्त होता है।

यह लगभग 115 से 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसका दाना मोटा और लंबा होता है। 30 से 35 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें उत्पादन देती है। इसका दाना बहुत वजनदार होता है। जिससे किसान अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यह एक रोग प्रतिरोधक किस्में है इसका दाना वजनदार होता है।

8. Rrx 113- धान की उन्नतकिस्ममेंसे एक है। यह लगभग 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इससे प्राप्तदाने चमकदार तथा लंबे वजनदार दाने हमें प्राप्त होती है। यह अधिक उत्पादन देने वाली किस्में है।

रोगों के प्रति सहनशील है। इसकी पौधे में ज्यादा फुटाओ होता है। यह एक आगे किसमें है जिसमें अगली फसलें समय से बोई जा सकती है। प्रत्येक बाली में लगभग 300 दाने हमें प्राप्त होते हैं। जिससे किसानों को अच्छी मात्रा में उत्पादन प्राप्त होता है।

9. Arise 6444- धान की यह नस्ल भारत में सबसे अधिक बिकने वाली हाइब्रिड धान है। लगातार लोकप्रिय के साथ यह 25 से 30% ज्यादा उपज देती है। यह लगभग 135 से 140 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। यह एक व्यापक अनुसंधान है। यह किस बीएलबी के लिए प्रतिरोधी के है। यह हाइब्रिड धान है।

धान की नस्लों  में हम यहाँ  बासमती चावल की कुछ नस्लों के विषय में आपको बता रहे हैं। जो पूसा बासमती से संबंधित है। भारत में बासमती की इन मसलों की सबसे ज्यादा पैदावार ली जा रही है। जिनमें कुछ निम्नलिखित है।

· Pusha 1509- धान की नर्सरी की यह वैरायटी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश में अन्य राज्यों में पाई जाती है। जिसकी उत्पादन क्षमता 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है। खाने में यह विशिष्ट स्वाद रखती है। जिसका निर्यात भारत के अलावा विश्व के अन्य देशों में भी किया जाता है।इसे पकने में लगभग 120 दिन का समय लगता है। यह बासमती चावल की बहुत अच्छी नस्ल में से एक है।

· Pusha 1728- धान की यह वैरायटी पंजाब, हरियाणा ,उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के लिए उपयुक्त है।यह 20 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से उत्पादन देती है। तथा 140 से 150 दिन के अंदर पक कर तैयार हो जाती है। यह भी विश्व के अनेक क्षेत्रों में निर्यात की जाती है।

· Pusha1637- धान की वैरायटी पंजाब झारखंड उत्तरप्रदेश व दिल्ली के अन्य क्षेत्रों में बोयी जाने वाली वैरायटी है। यह लगभग 130 दिन के अंतराल में पक कर तैयार हो जाती है। तथा 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से हमें उत्पादन देती है।

· Pusha 1718- धान की नस्ल लगभग 140 से जो 45 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। वही 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से हमें उत्पादन प्रदान करती है। यह विश्व के अनेक देशों में निर्यात की जाने वाली फसल है। क्योंकि खाने में यह बहुत ही स्वादिष्ट होती है।

 अब हम आपके साथ उन नस्लों के विषय में जानकारी साझा करेंगे। जिनसेमहिन धान हमें प्राप्त होती है। अतः टॉपिक की आखिरी तक बने रहें।

· Kaveri sampurn KP 108 – धान कीयह नस्ल अति आवश्यक नस्ल है। जो लगभग 120 से 140 दिन के अंदर पक कर तैयार हो जाती है। तथा लगभग 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें पैदावार देती है। इनमें कल्लो की संख्या अधिक होती है। तथा इस नस्ल के पौधों में रोगों की कमी पाई जाती है। इनका तना मोटा होता है ।जो जमीन से अच्छे से बंधा होता है। विपरीत परिस्थितियों में यह गिरकर टूटता नहीं है।

· Prasanna – to धान की यह नस्ल लगभग 130 से 135 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। तथा इससे प्राप्त होने वाली दाने लंबी व पतले होते हैं। लगभग 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से यह हमें उत्पादन प्रदान करती है ।

· श्रीराम सुपर 505- धान की य नस्ल से लगभग 135 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसमें पौधों की औसत ऊंचाई 105 सेंटीमीटर की होती है। तथा यह 23 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से हमें उत्पादन प्रदान करती है।

· नाथ सीट से पूर्वा कामिनी- यह नस्लें पतले चावलों की बहुत अच्छी नस्लें है ।जिससे हमें लगभग 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से उत्पादन प्राप्त होता है। यह नस्ले लगभग 130 से 140 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। तथा इससे जो पौधे हमें प्राप्त होते हैं। उनमें रोग नहीं पाए जाते। वहीं इनका तना भी बहुत मोटा हो जाता है। तथा कल्लो की संख्या बहुत अच्छी पाई जाती है। जिससे हमें बाली भी लच्छेदार प्राप्त होती है।

· एड्रेस की नीलिमा यह धान की बहुत बढ़िया नस्लों में से एक है। जो लगभग 130 से 135 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। 30 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से यह हमें उत्पादन देती है। तथा यह मिट्टी से जकड़ी रहती है। तथा पोषक तत्व धारण करने की क्षमता इसमें बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है।

धान की इन सभी नस्लों से हमें बहुत अच्छी पैदावार प्राप्त होती है। इन से उत्पादित दाने लंबे व पतले होते हैं ।खाना खाते ही यह मुंह में घुल जाते हैं। तथा विशिष्ट स्वाद प्रदान करते हैं।

इन नस्लों की डिमांड मार्केट में सबसे ज्यादा होती है। क्योंकि यह उत्पादन बहुत अधिक मात्रा में हमें देती है। इनमें जल संग्रहण क्षमता भी बहुत अच्छी पाई जाती है। तथा सबसे अच्छी बात यह है कि इन सभी ब्रीड्स में रोगों से लड़ने की क्षमता बहुत अच्छी होती है। इन सभी से आरोपित पौधों में रोग नहीं पाए जाते।

· Pac 807- धान की यह नस्ल एडवांस एडवांटा गोल्डन सिटी की बहुत ही जल्दी आने वाली वैरायटी है। जो लगभग 100 दिन में ही पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म बीएलबी के प्रति सहनशील है ।कंपनी में ज्यादा उत्पादन देने वाली वैरायटी है ।इसके दाने लंबी पतली सफेद होते हैं। यह खासकर पूर्वी व उत्तरी भारत के लिए उपयुक्त किस्म है।

· धान की खेती करने की दो आवश्यक विधियां

धान की खेती की विशेष जानकारी के क्रम में विशिष्ट बिंदुओं के आधार पर दो विधियों के विषय में बताएंगे। जिससे हम अपने खेतों में अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

पहली विधि होती है शुष्क सीधी विधि तथा दूसरी विधि होती है नमी युक्त सीधी विधि।

इन दो विधियों के माध्यम से हम सभी क्षेत्रों में धान की फसल प्राप्त करते हैं ।अलग-अलग क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता के आधार पर इन दोनों विधियों के माध्यम से फसल उगाई जाती है जिन के विषय में हम आपको समुचित जानकारी देने जा रहे हैं।

· शुसक सीधी विधि–शुष्क सीधी विधि उन क्षेत्रों में प्रयोग में लाई जाती है। जहां पर पानी की निर्भरता कम होती है। जहां सिर्फ बारिश के माध्यम से ही खेती सुविधाजनक होती है।

या पानी के स्रोत बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। वहां हम उसको सीधी विधि का प्रयोग करके धान की खेती करते हैं।

इसके संबंध में कुछ जानकारी देने की आवश्यकता है।शुष्क सीधी विधि में सर्वप्रथम हम खेत की जुताई कर अपनी जमीन को समतल कर लेते हैं। जमीन को समतल करने के पश्चात हम डी कमपोस्ट की गई गोबर की खाद की लगभग आधा सेंटीमीटर तक की परत को संपूर्ण क्षेत्र में डालते हैं।जहां हमें बीज रोपित करना है, वहां बिछा देते हैं। उसके पश्चात बीजोंकोबोयाजाता हैं।

बीज कोसिड्रिल की सहायता से हमें 3 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए ।तथा बीज से बीच की दूरी लगभग 5 सेंटीमीटर रखना चाहिए ।इसके बाद हम अपने खेतों में दोबारा कंपोस्ट खाद का प्रयोग करते हैं ।

रासायनिक खाद का प्रयोग हमें किस प्रकार करना है। उन पर उसकी समुचित जानकारी दी गई है। उसे भी अवश्य पढ़ें। इस प्रकार बीज बोने के बाद हमें 2 से 3 दिन पश्चात बारिश हुई याना होने की स्थिति में उपयुक्त संसाधनों के द्वारा बीजों को पानी देना चाहिए।

इस प्रकार शुष्क सीधी विधि के द्वारा हम अपने बीजों को खेतों में डालते हैं। तथा फसल प्राप्त करते हैं। शुष्क सीधी विधि के द्वारा बुवाई करने से हमें निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं। जो निम्नलिखित हैं।

· परंपरागत विधि से धान की बुवाई करने पर हमेंसमयऔरश्रम अधिक लगता है। क्योंकि इसमें मजदूरों की आवश्यकता होती है ।

· सीधी विधि से हमें श्रम कम लगता है। तथा हमें नर्सरी लगाने में अपने पौधों की देखभाल करने की आवश्यकता नहीं होती।

· सबसे अच्छा फायदा यह है कि हमें दीजों की सीधी खेतों में ही बुवाई करनी होती है। जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है ।

· इससे फसलें लगभग परंपरागत विधिकीअपेक्षा फसलों से लगभग 10 दिन पहले ही आ जाती है। खड़ी फसल की स्थापना में फायदमंद है।

· यह अत्यधिक आवश्यक विधि है। इसके द्वारा फसल उगाने से मिट्टी में नमी बनी रहती है। और पौधे वाष्पीकरण को कम करते हैं ।

· इस विधि से पानी की बचत की जा सकती है ।

· परंपरागत विधियों की अपेक्षा संसाधनों की बचत होती है। मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है। तथा खेती का कामों में यंत्रों का प्रयोग करने से 25% श्रम की बचत होती है।

· परंपरागत विधि बचने के लिए तथा अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त करने के लिए विधि है। इससे खर्च भी बहुत कम आता है। तथा उस विधि की तुलना में उत्पादन भी हमें अधिक प्राप्त होता है।

इस प्रकार से सीधी विधि के प्रयोग से धान बोने पर हमें कम खर्च कम लागत का फसल में अत्यधिक अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। किसानों के लिए यह विधि बहुत ही सरल है। क्योंकि सीधे खेतों में हमें भी बीजों को बोनाहोता है। तथा समय-समय पर पानी की व्यवस्था करनी होती है। और फसल हमें सीधी खड़ीफसल प्राप्त हो जाती है। अतः यह धान उत्पादन करने की बहुत अच्छी विधि है।

·गीली सीधी विधि

गीली सीधी विधि धान की फसल की दूसरी विधि है। जो परंपरागत तरीके से धान की फसल बोने पर हमें उत्पादन प्रदान करती है। सीधी गीली विधि से होने पर हमें पैदावार में बढ़ोतरी मिलती है।इससेफसलपकने में समय लगता है। परंतु यह पैदावार अच्छी देतीहै।

गीली सीधी विधि के माध्यम से फसल उत्पादन में मजदूरों के द्वारा संपूर्ण कार्य कराया जाता है ।अतः इसमें श्रम की आवश्यकता अधिक होती है। सीधी गीली विधि के माध्यम से फसल बोने हेतु खेत की तैयारी किस प्रकार से करें यह निम्नानुसार बताया गया है।

सर्वप्रथम हमें हमारे खेत की को समतल करने के लिए खेत की जुताई करवाना आवश्यक होता है। अतः गेहूं की फसल कटने के बाद हमें खरपतवार को जलाकर ट्रैक्टर के माध्यम से जुताई करवाना चाहिए।

कल्टीवेटर या मिट्टी पलटने वाले हल के माध्यम से हमें दोबारा अपने खेतों को जोतना चाहिए। जिससे मिट्टी के पोषक तत्व आपस में मिल जाए। तत्पश्चात हमें मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए पुनः जताई करवाना चाहिए।

खेत समतल होने के पश्चात हमें हमारे खेतों से खरपतवारनिकालनेहेतुमजदूरों की सहायता ले सकते हैं।अन्यथा ऊपर खरपतवार नासी का संपूर्ण विवरण दिया गया है। जिसके आधार पर हम हमारे खेत में उन खरपतवार नाशी का प्रयोग करके अपने खेतों से खरपतवार हटा सकते हैं। खरपतवार नाशी डालने के तुरंत बाद 2 या 3 दिन तक हमें पानी अपने खेतों में लगाना होता है। तथा कुछ समय पश्चात ही काई की एक परत खरपतवार के रूप में जमा हो जाती है। और खरपतवार हमारे खेत से अलग हो जाते हैं।

खेत में खरपतवार हटाने के पश्चात हमें हमारे खेतों में गोबर की खाद की एक पतली परत लगभग आधे सेंटीमीटर की बिछानी होती है।

गोबर की खाद की से जिन पौधों की नर्सरी तैयार की है। आसानी से निकाले जा सकते हैं। जड़ सहित वह बाहर आ जाते हैं। बीच से वह टूटते नहीं है ।ऐसा करने पर उनके तने मजबूत प्राप्त होते हैं ।खेत में गोबर की खादडालने के बाद हमें बीज बोना चाहिए।

बीज बोने से पहले बीजों को उपचारित करना आवश्यक होता है। सर्वप्रथम एक ड्रम में पानी भरकर रखना है। तथा जोबीजलिएहै। उन्हें डाल देना चाहिए।

ऐसा करने पर कमजोर बीज ऊपर आकर पानी में तैरने लगते है ।तथा स्वास्थ्य बीज पानी की तली में जमा हो जाते हैं। पानी की तली में जमा हुए स्वस्थ बीजों को उपचारित करके उन्हें सुखाकर हम बोने के लिए तैयार कर लेते हैं।

नर्सरी निर्माण करने से पूर्व हमें हमारे खेत में क्यारियों का निर्माण करना होता है। क्यारियों का निर्माण इस प्रकार से करना है की क्यारी से क्यारी की दूरी लगभग 5 से 6 सेंटीमीटरहो।इनके बीच में जो स्थान छूटा हुआ है। वह आने जाने हेतु तथा खेत में पानी की व्यवस्था एवं दवाइयों का छिड़काव करने हेतु उपयुक्त होता है।

ऐसा करने से हमारे पौधे पौधों को नुकसान नहीं होता।क्यारियों के निर्माण के पश्चात हमें हमारे बीजों कीबोवाई आरंभ करना होता है।

बीज की बुवाई ज्यादा गहराई पर ना हो लगभग ढाई से 3 सेंटीमीटर गहराई पर हमें हमारे बीजों की बुवाई करना है।ऐसा करने पर पौधे की जड़ ज्यादा अंदर तक नहीं जाती। ऊपर की ओर उतरी हुई होती है ।जिससे तना मोटा होता है। तथा कल्ले अधिक संख्या में फूटते हैं।

कल्ले अधिक संख्या में फूटने पर धान की बाली हमें मजबूत तथा संख्या में अधिक प्राप्त होती है।

नर्सरी मैं पौधों से पौधों की दूरी ज्यादा नहीं रखनी चाहिए।पोधेघनी अवस्था में हो तथा उनकी बुवाई सीधी लाइन में हो।ऐसेबुवाई करने से उखाड़नेपर पौधे बहुत आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।

एक-एक करके हमें हमारे पौधों को जड़ से उखाड़ लेना चाहिए। तथा पुनः जिस खेत में हम रोपाई करना है। सर्वप्रथम पानी भरना चाहिए। पानी भरने के पश्चात हमें निश्चितदूरी पर उन पौधों की रोपाई करना होगा।

हमें यह ध्यान रखना है कि नर्सरी लगभग 20 से 21 दिन तक ही हो। ज्यादा हम अगर समय देते हैं तो पौधों की ऊंचाई बढ़ जाती है। पौधों की ऊंचाई बढ़ने पर अगर हम उन्हें दूसरे स्थान पर रोपित करते हैं। तो उनका तना दुर्बल हो जाता है। तथा पेड़ों के गिरने की आशंका बढ़ जाती है ।अतः पौधे मध्यम ऊंचाई के हो तभी हमें उन्हें दूसरी ओर रोपना चाहिए।

पौधों की रोपाई एक के बाद एक लाइन से मजदूरों की सहायता से कराना चाहिए। ध्यान रहे कि पौधा बीच से टूटा ना हो बहुत ही सुलभता पूर्वक हमें बहुत सावधानी से पौधों की रोपाई करना चाहिए।

पौधों की रोपाई करने के पश्चात हमें खेतों में पानी की कमी नहीं होने देना है। क्योंकि परंपरागत विधि से खेती करने के लिए हमें पानी की भरपूर मात्रा की आवश्यकता होती है। अन्यथा हमारी फसलों को सीधा प्रभाव पड़ता है। समय-समय पर हमें निंडाई की आवश्यकता होती है ।अर्थात हाथ से ही हमें खरपतवार समय-समय पर निकालते रहना चाहिए। इस प्रकार से हम धान की गीली सीधी विधि के द्वारा भी फसल उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार से फसल उत्पादन दोगुना प्राप्त होता है। तथा प्राप्त हुए दाने भारी चमकदार एवं खाने में स्वादिष्ट प्राप्त होते हैं।

पारंपरिक विधि से खेती करने में अर्थात धान की फसल की बुवाई करने में रखी जाने वाली सावधानियां निम्नलिखित है। जिन्हें निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।

· सर्वप्रथम खेत की जुताई बहुत अच्छे से करना चाहिए। खेतों को समतल करवाना प्रथम चरण है। मिट्टी को हमें भुरभुरा बनाना आवश्यक होता है।

· नर्सरी लगाने से पूर्व खेतों में पानी भरपूर मात्रा में भरा होना चाहिए। पानी की कमी होने से हमारी फसलों को सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

· फसलों को रोपने से पूर्व खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है।

· बीज की बुवाई के पूर्व खेतों में डी कंपोस्ट की हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से हमने जो बीज रोपे हैं। उनकी पौधे सरलता पूर्वक बाहर निकल आते हैं। वह बीच से टूटते नहीं है। और उनका तरना दुर्बल भी प्राप्त नहीं होता।

· खरपतवार नियंत्रण हाथों की सहायता से हो तो ज्यादा अच्छा होता है।

· हमें हमारी फसलों में समय-समय पर नींद आई एवं गुड़ाई की आवश्यकता होती है।

· खेत में नियंत्रित मात्रा में खरपतवार नाशक कीटनाशी एवं खाद का प्रयोग करना चाहिए। अन्यथा हमारी फसलों को प्रभाव पड़ता है।

· खेतों में फास्फोरस की मात्रा नियंत्रित अवस्था में होनी चाहिए। क्योंकि जब हम गेहूं की खेती करते हैं ।तो उन फसलों में भी फास्फोरस की निश्चित मात्रा में प्रयोग लेते हैं। जिसकी मात्रा आखिरी तक बनी रहती है ।मिट्टी में फास्फोरस तत्व धान की खेती के लिए भी विद्यमान होते हैं ।अतः फास्फोरस का प्रयोग नियंत्रित अवस्था में जितना आवश्यक हो उतना ही करना चाहिए।

· पौधों को निकालते समय ध्यान रखना चाहिए कि कल्ले अधिक मात्रा में लगभग 4 से 5 काले पौधों में फूटे हो।

· नर्सरी अधिकतम 20 से 21 दिन की ही रखना चाहिए। जिससे पौधे मध्यम ऊंचाई के हो पौधों की ऊंचाई ज्यादा ना हो पाए। उससे पहले ही हमें उन्हें उखाड़ कर दूसरी जगह रोपित कर देना चाहिए।

· पौधों को सावधानीपूर्वक उखाड़े याद रहे कि जड़ सहित पौधे बाहर आना चाहिए।

आज का हमारा टॉपिक धान की खेती से संबंधित रहा है।धान की खेती से संबंधित और अधिक जानकारी के लिए आप हमारी साइट पर विजिट करते रहे।और हमसे आपके विचार साझा करते रहें।धान की खेती के संबंध में अगर आप और अधिक जानकारी चाहते हैं।तो हमसे आपके विचार साझा जरूर करें।विचार साझा करने के लिए आप हमारे कमेंट बॉक्स पर कमेंट कर बता सकते हैं।आगे के टॉपिक में हम सोयाबीन की खेती से संबंधित जानकारी लाइंगे।आपको इससे संबंधित और अधिक जानकारी प्राप्त करना है तो कॉमेंट कर जरूर बताएं।

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