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(Lauki ki kheti )लौकी की खेती :-कब और कैसे करें जानिये पूरी जानकारी

भारत में लौकी की खेती (Lauki ki kheti ) हेतु कौन सी परिस्थितियां अनिवार्य है। सभी जानकारी के लिए टॉपिक को लास्ट तक जरूर पढ़ें।

आज हमारे इस टॉपिक में किस प्रकार से लौकी की खेती कैसे करें (Lauki ki kheti kaise kare) तथा लौकी की खेती में क्या क्या सावधानियां रखना है ।उन सभी के विषय में बताया जा रहा है।उससे पहले हम आपको बता देना कहते है की लौकी को इंलिश में बॉटल गॉर्ड (bottle gourd) कहते है ( lauki in english called bottle gourd).

लौकी (lauki) कद्दू वर्ग की एक महत्वपूर्ण सब्जी है। इसकी खेती(kheti) के अलावा, विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे रायता, कोफ्ता,लौकी का हलवा (lauki ka halwa) का उपयोग खीर आदि बनाने के लिए किया जाता है। यह कब्ज को कम करने, पेट साफ करने, खांसी और बलगम को दूर करने में बहुत फायदेमंद है।

प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट के अलावा, इसके नरम फलों में खाद्य रेशा खनिज लवण कई विटामिनों में प्रचुर मात्रा में होते हैं। लौकी की खेती (lauki ki kheti) व्यापक रूप से पहाड़ी क्षेत्रों से दक्षिण भारत के राज्यों में की जाती है। सब्जियों में लौकी निर्यात के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है।

लौकी के जूस (bottle gourd juice) पीने के कुछ फायदे :-

  • आपके शरीर को ठंडक पहुँचता है।
  • वजन घटाने में मदद करता है।
  • मूत्र पथ के संक्रमण का इलाज करता है।
  • पेट की परेशानी को ठीक करता है।
  • आपके दिल को स्वस्थ रखता है।
  • तनाव को दूर करता है।

लौकी की खेती (lauki ki kheti) हेतु आवश्यक बिंदुओं पर जानकारी:-

भारत देश में लौकी की खेती बहुत ही अनिवार्य खेती के रूप में है। जिसके बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

लौकी की खेती करने से फायदे भी बहुत हैं। क्योंकि लौकी की खेती हम हर मानसून में ,हर जलवायु में कर सकते हैं।यहां तक ही नहीं लौकी की खेती करने का फायदा इसलिए भी है क्योंकि यह व्यापक स्तर पर पसंद की जाती है ।

लौकी की खेती हेतु हमें ज्यादा खर्च की आवश्यकता नहीं होती ।तथा हम अधिक से अधिक मुनाफा भी उठा सकते हैं। लौकी की खेती में बहुत लाभ होता है। क्योंकि यह एक स्वास्थ्यवर्धक सब्जी है। लौकी का जूस कैंसर के मरीज को तक दिया जाता है।स्वास्थ्यवर्धक भी है ।

लौकी की खेती के लिए हमें किन बिंदुओं के बारे में पढ़ना है। किन बिंदुओं के बारे में जानकारीलेना है।उनके बारे में बताया जा रहा है । अतः टॉपिक के अंत तक बने रहे।

लौकी की खेती (Lauki ki kheti)  करने का समय:-

लौकी की खेती करने हेतु भारत में हर समय अनुकूल होता है ।परंतु अच्छी पैदावार तथा अच्छी किस्म की पैदावार हेतु हमें एक मुख्य बिंदु के बारे में पढ़ना है ज इससे हमें यह जानकारी प्राप्त होगीकि हमें लौकी की खेती किस उपयुक्त समय पर करना है। उसके विषय में बताएगा।

अतः हम आपसे बताने जा रहे हैं ,कि अगर हम बरसात के समय लौकी की खेती करना चाहते हैं। तो उसका उपयोग समय जुलाई से अगस्त में बुवाई करने का है। तथा अगर हम गर्मियों की खेती करना चाहते हैं। तो उसका उपयुक्त समय नवंबर से दिसंबर का है।

इस समय में हम जब खेती करते हैं तो हमें अच्छा लाभ मिल सकता है।

लौकी की खेती (Lauki ki kheti)  हेतु मानसून व जलवायु:-

अच्छी लौकी की पैदावार के लिए गर्म और आर्द्र भौगोलिक क्षेत्र सर्वोत्तम हैं। इसलिए, जायद और खरीफ दोनों मौसमों में इसकी फसल सफलतापूर्वक उगाई जाती है। बीज के अंकुरण के लिए उच्चतम तापमान 30 से 33 डिग्री सेंटीग्रेड और पौधे के विकास के लिए 32 से 38 डिग्री सेंटीग्रेड है।

लौकी की खेती हेतु मानसून गर्म वातावरण का होना चाहिए । इससेअच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है ।

इसी के साथ हमें मिट्टी का भी ध्यान आया है,मृदा में नमी उपयुक्त मात्रा में हो।तथा उसका पी. एच. मान भी संतुलित मात्रा में होना चाहिए।

खेत की तैयारी:-

उच्च जल धारण क्षमता वाली सैंडी दोमट और बलुई मिट्टी और 6:00 से 7:00 तक पीएच मान लौकी की खेती के लिए उपयुक्त हैं। पथरीली या ऐसी भूमि जहाँ पानी का उपयोग किया जाता है और जल निकासी का कोई अच्छा प्रबंध नहीं है, इसकी खेती अच्छी नहीं है।

खेत की तैयारी के लिए पहले मिट्टी की जुताई  की जाती है और बाद में 23 जुताई कल्टीवेटर द्वारा की जाती है। हर जुताई के बाद खेत में खुदाई करके मिट्टी को ब्रश और चपटा करना चाहिए ताकि खेत की सिंचाई करते समय कम या ज्यादा पानी न निकले।

लौकी की खेती हेतु सर्वप्रथम हमें गोबर की खाद डाल के जुताई करवाना चाहिए। ताकि पूरा खेत समतल हो जाए।
खेत समतल होने के पश्चात हमें उपयुक्त स्थान लेकर क्यारियां बनाना चाहिए। तथा क्यारियां के बीच में नाली की उपयुक्त व्यवस्था की जानी चाहिए।

खाद की व्यवस्था:–

लौकी की खेती (Lauki ki kheti ) में हमें खेत समतलीकरण के पहले ही खाद की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। हमें सर्वप्रथम 1 हेक्टेयर भूमि में 7 से 8 ट्राली गोबर की खाद का छिड़काव अच्छे से पूरे खेत में करना चाहिए । इसकी खेती हम जैविक खेती(jaivik kheti) के रूप में भी कर सकते है।

जैविक खाद के रूप में प्रयोग की जाती है। तथा यह सबसे अच्छी खाद्य और उपयुक्त खाद खेती हेतु मानी जाती है। इसके पश्चात ही खेत का समतलीकरण करना चाहिए।

रासायनिक उर्वरक हेतु हम 2 बोरी डीएपी तथा ३ बोरी पोटाश का छिड़काव भी अपने खेतों में करवा सकते हैं।ज्यादा से ज्यादा उपयुक्त हो तो हम गोबर की खाद का ही प्रयोग करें।

बीजों का चयन: –

खेती(Kheti ) में हमें बीजों का चयन करना एक बहुत महत्वपूर्ण चरण है। बीजों का चयन करने से पहले हमें उनको जांच लेना चाहिए ।

अगर हम पिछले साल के रखे हुए या कुछ समय पहले के रखे हुए बीजों का प्रयोग कर रहे हैं।तो हमें उनका शोधन कर देना चाहिए। बाजार में अच्छी मात्रा वाले हाइब्रिड बीजों का प्रयोग अपनी खेती हेतु करना चाहिए।

या सरकारी संस्थान से प्राप्त करने के पश्चात उनका शोधन करना चाहिए फिर उन्हें बुवाई हेतु प्रयोग करना चाहिए।

बीजों की बुवाई:-

लौकी की खेती (Lauki ki kheti )में बीजों की बुवाई हेतु हमें ध्यान रखना है कि सर्वप्रथम हमें क्यारियों का निर्माण करना है।क्यारियों का उचित क्रम लेकर हमें उन्हीं क्यारियों में गड्ढे बनाना है ।तथा प्रत्येक गड्ढे में लगभग तीन से चार बीजों की बुवाई करना है।

नालियों की उचित व्यवस्था:-

हमें क्यारियों के बीच में उचित प्रकार से नालियों की व्यवस्था करनी चाहिए।उन्ही नालियों में हम पानी तथा खाद का प्रवाह करके खेती को उन्नत व उपयुक्त बना सकते हैं।

क्यारियों का स्थान:-

लौकी की खेती हेतु क्यारियों का स्थान होना चाहिए। हमें प्रत्येक क्यारियों को लगभग 3 से 4 इंच दूरी पर बनाना है। तथा प्रत्येक क्यारियों में बीजों का क्रम भी थी चार ही होना चाहिए इससे अधिक नहीं।

क्यारियों की कतारों का स्थान:-

लौकी की खेती करते समय क्यारियों की व्यवस्था हमने ली है ।वह एक कतार में बन जाती है। और सभी कतार में जो चौड़ाई है वह लगभग हमें 10 से 12 इंच की लेना है।

जल की उचित व्यवस्था:-

लौकी की खेती में जल की उचित व्यवस्था एक महत्वपूर्ण बिंदु है। जल की व्यवस्था हेतु हमें यह सुनिश्चित करना है। कि गर्मियों में लगातार दो से 3 दिन के अंतराल में लौकी के पौधों को पानी मिलता रहे ।

अन्यथा उनमें प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता। अतः हमें दो से 3 दिनों के अंतराल में पानी देते रहना चाहिए। अगर बात की जाए बरसात के दिनों की तो बरसात के दिनों में भी हमें 5 से 6 दिनों में पानी देते रहना चाहिए। अन्यथा ऐसा नहीं करने पर भी लौकी के वृक्षों में प्रभाव पड़ता है।

लौकी की उपयुक्त पैदावार:-

लौकी की पैदावार इनसारी सावधानियों को लेकर हम बहुत अच्छी प्राप्त कर सकते हैं। इनकी पैदावार हम इनकी किस्मों के निर्धारण के साथ करते हैं।

अलग अलग किस्मों के साथ हम अलग-अलग वजन की लौकी की पैदावार कर सकते हैं।

1 हेक्टेयर में लगभग 400 से 500 किलोग्राम लौकी की पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। जो एक किसान के लिए बहुत ही लाभकारी होती है। तथा यह बाजार में देखते ही देखते विक्रय हो जाती है। तथा हमें उचित मात्रा में मूल्य भी प्राप्त हो जाता है।

लौकी की फसलें

कोयंबटूर 1:- यह जून व दिसंबर में बोने के लिए उपयुक्त किस्म है इसकी उपज 280 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है जो लवली शायरी और सीमांत मृदा में उगाने के लिए उपयुक्त होती है।

अर्काबहार:- यह खरीफ और जायद दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है बीज बोने के 120 दिन बाद फसल की तुड़ाई की जा सकती है। इसकी उपज 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

उषा समर प्रोलिफिक राउंड:– यह अगेती किस्म है।इसकी बेलो का बढ़वार अधिक और फैलनेवाली होती है। कल गोल मुलायम कच्चा होने पर 15 से 18 सेंटीमीटर तक के घेरे वाले होते हैं जो हल्के हरे रंग के होते हैं। बसंतऔर ग्रीष्म दोनों ऋतु मैं उपयुक्त हैं।

पंजाब गोल:- यह किस्म के पौधे घनी शाखाओं वाले होते हैं। और यह अधिक फल देने वाली किस्म है। फल गोल कोमल और चमकीले होते हैं। इसे बसंत कालीन मौसम में लगा सकते हैं। इसकी ऊपर 175 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

पुसासमर प्रोलीफिकलॉन्ग:– यह किस्म गर्मी और वर्षा दोनों ही मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त रहती है। इस की बेल में बड़वार अच्छी होती है इसमें फल अधिक संख्या में लगते हैं। इसकी फल 40 से 45 सेंटीमीटर लंबे तथा 15 से 22 सेंटीमीटर घेरे वाले होते हैं जो हल्के हरे रंग के होते हैं। इसकी उपज 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

नरेंद्र रश्मि:- यह फैजाबाद में विकसित प्रजाति है। प्रति पौधों से औसतन 10 से 12 फल प्राप्त होते हैं। फल बोतल नुमा और सक्रिय होती है। डंठल की तरफ गुदा सफेद और करें 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

पूसा संदेश:- इसके फलों का औसतन वजन 600 ग्राम होता है एवं दोनों रितु हमें इसकी फसल बोई जाती है। 60 से 65 दिनों में फल देना शुरू हो जाता है और 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होती है।

पूसा हाइब्रिड 3:- फल हरे लंबे एवं सीधे होते हैं। फल आकर्षक हरे रंग एवं 1 किलो वजन के होते हैं। दोनोंमौसम में इसकी फसल ली जा सकती है। यह संकर किस्म 425 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है। फल 7 से 65 दिनों में निकलने लगते हैं।

पूसा नवीन:- यह संकर किस्म है फल सुडोल आकर्षक हरे रंग के होते हैं एवं औसतन उपाय 400 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है यह उपयोगी व्यवसायिक किस्म है।

आज के हमारे इस टॉपिक के बारे में हमें कमेंट करके जरूर बताएं। तथा खेती से जुड़ी और अधिक जानकारी के लिए आप हमारी साइट पर विजिट करते रहे ।

और आप किस विषय में जानकारी लेना चाहते है। इस विषय में हमें कमेंट करके जरूर बताते रहे। हमारा अगला टॉपिक खेती बाड़ी से संबंधित तथ्य आपके सामने लाता रहेगा।

हम आगे के बिंदुओं में लौकी में लगने वाले रोग तथा उसके नियंत्रण हेतु जानकारी वितरण करेंगे अतः हमारे अन्य टॉपिक को ध्यान से पढ़ें तथा हमारी साइट पर विजिट करते रहे।

बहुत सारे  किसान आजकल लौकी की खेती को जैविक खेती organic farming के रूप में करते है और बढ़िया लाभ कमा रहे है

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