Homefarming guideभिंडी की खेती की पूरी जानकारी। Ladyfinger farming guide in hindi

भिंडी की खेती की पूरी जानकारी। Ladyfinger farming guide in hindi

भिंडी की खेती

भिंडी हरी सब्जी के रूप में प्रयुक्त होने वाली फसल है। जिसका प्रयोग सभी किसान अपने खेत में एक लाभदाई फसल के रूप में करते हैं।भिंडी को लेडी फिंगर के नाम से भी जाना जाता है। यह दिखने में फिंगर (ऊँगली) की तरह होती है। इसीलिए इसे इस नाम से संबोधित किया जाता है।

भिंडी में बहुत से पोषक तत्वों की विद मानता होती है। जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, खनिज लवण, कॉपर, विटामिन ए ,बी तथा सी प्रमुख रूप से पाया जाता है ।भिंडी में आयोडीन की मात्रा भी अच्छी पाई जाती है ।जिससे यह हमारे लिए तथा हमारे शरीर के लिए बहुत ही उपयोगी होती है ।

भिंडी की फसल पूरे विश्व में की जाती है। तथा यह हर किसान के लिए सफल फसल के रूप में उभर कर आई है। भिंडी को हम बरसात या गर्मी के मौसम में वह कर प्राप्त कर सकते हैं।

आज का मारा टॉपिक भिंडी की फसल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ होगा। अतः टॉपिक के अंत तक बने रहे।

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भारत में भिंडी की खेती

भारत संपूर्ण विश्व में भिंडी की खेती के लिए प्रथम स्थान रखता है। यहां कई हजार हेक्टेयर भूमि पर एक साल में भिंडी की फसल का उत्पादन किया जाता है। भारत में कई राज्यों में भिंडी की फसल बोई जाती है। जिसमें कई स्थान प्रमुख है जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार असम, गुजरात ,कोलकाता ,दिल्ली, महाराष्ट्र, इत्यादि प्रसिद्ध है।

हालांकि भारत के संपूर्ण राज्यों में भिंडी की खेती की जाती है। क्योंकि भिंडी लगभग सभी लोगों के लिए बहुत ही पसंदीदा सब्जी है। जिसे सभी लोग खाना पसंद करते हैं ।अतः यह भारत में बहुत बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। तथा इसका विक्रय भी बड़े पैमाने पर भारत में किया जाता है। आजकल सभी लोग अपने घर पर ही छोटी सी जगह पर भिंडी का उत्पादन करते हैं। तथा इसका लाभ घरेलू खर्च के लिए लेते हैं।

आगे हम आप को भिंडी से संबंधित और अधिक जानकारी देंगे। कृपया आगे भी पढ़ें।

भिंडी की खेती कैसे करें ?

सभी किसान भिंडी की खेती करते हैं। तथा बहुत सी सावधानियां रखकर भिंडी की अलग अलग मौसम में खेती की जाती है। आगे टॉपिक में हम आपको बतएंगे की खेती किस प्रकार से करें। तथा किन परिस्थितियों का हमें ध्यान रखना आवश्यक है ।इसके विषय में संपूर्ण जानकारी बिंदुवार दी जा रही है। कृपया लेख को अंत तक पढ़ते रहे।

· भूमि की तैयारी-

भिंडी की खेती के लिए खेत का समतल होना अति आवश्यक है। अतः हमें भिंडी की खेती के लिए खेती की जुताई लगभग दो से तीन बार करवाना चाहिए। खेत की तैयारी के लिए हमें मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए खेत की गहरी जुताई करना अति आवश्यक होता है।

खेत की गहरी जुताई करने के पश्चात हमें दोबारा कल्टीवेटर के माध्यम से खेत की जुताई करना चाहिए। जिससे कि आवश्यक पोषक तत्व मिट्टी पलटने पर मिट्टी के ऊपर आ सके। इसके पश्चात हमें पाटा चलवाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। इस प्रकार से भूमि की तैयारी पूर्ण होती है। भूमि हमें इस प्रकार से चयनित करना है। कि वह भिंडी की फसल के लिए उत्तम हो। तथा भिंडी की फसल के साथ हम सहखेती के रूप में रवि और खरीफ की फसलों का भी प्रयोग कर सकते हैं।

· मिट्टी एवं जलवायु

 भिंडी की खेती के लिए मिट्टी एवं जलवायु दूसरा चरण है।जो कि महत्वपूर्ण होता है। हम मिट्टी की फसल किसी भी मिट्टी में ले सकते हैं। चाहे वह दोमट हो, काली मिट्टी,बलुई मिट्टी ,हो चिकनी मिट्टी ,में सभी प्रकार की मिट्टियों में भिंडी की खेती सुलभता से की जा सकती है।

इससे पहले हमें पीएच मान का ज्ञान होना अति आवश्यक है। मिट्टी का पीएच मान 7 से 7.5 लगभग होना चाहिए ।चाहे तो मिट्टी का परीक्षण किसी भी अनुसंधान क्षेत्र से कर सकते हैं। जो हमारी भिंडी की फसल के लिए आवश्यक हो।

इसके पश्चात मिट्टी तापमान अधिक से अधिक 45 डिग्री सेंटीग्रेड होना अति आवश्यक है। तथा कम से कम 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान का होना आवश्यक होता है। मिट्टी के तापमान कीअनुकूलताकी आवश्यकता भिंडीमें आवश्यकता होती है। तथा 20 डिग्री सेंटीग्रेड से तापमान कम है ।तो पौधे अंकुरण क्षमता खो देते हैं ।तथा बीज अंकुरित नहीं हो पाते ।अतः तापमान का इस पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

· बीज की बुवाई-

 भिंडी की खेती या तो गर्मी में या बरसात के मौसम में की जाती है।इसलिए बीज की बुवाई किस प्रकार से करना है। इन दोनों की विधि दोनों मौसम के लिए अलग-अलग होती है। भिंडी के बीज की बुवाई खुले क्षेत्र में ही की जाती है। जो दाना छिड़ककर होती है।

जब हम गर्मियों में खेत में बीज की बुवाई कर रहे होते हैं। तो हम नाली विधि या मल्चिंग विधि का प्रयोग कर सकते हैं।नाली विधि में हम बीच में नाली बनाकर नाली के दोनों ओर क्यारियों का निर्माण करते हैं। तथा उसमें हम अपने बीच को बोते हैं। क्यारी से क्यारी के बीच की दूरी लगभग 40 सेंटीमीटर रखना आवश्यक होता है ।तथा बीज से बीच की दूरी लगभग 10 से 12 सेंटीमीटर रखनी चाहिए ।वही बुवाई करते हैं तो बीज को लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर आवश्यक होता है।

जब हम बरसात के समय में भिंडी के बीज की बुवाई करते हैं। तो इसके लिए हम मेढ़ेंबनाकर ऊंचाई पर बीज की बुवाई करें तो अच्छा होता है। क्योंकि इस समय पर पानी नीचे भरा होता है। जो हमारी फसल के लिए हानि पहुंचा सकता है। अतः इसीलिए हमें मेढ बनाकर ऊंचाई पर बीज आरोपित करना चाहिए ।जिससे कि हमें फसल को हानि होने से बचाने में सुविधा हो।

· बीज बुवाई का समय बीज की मात्रा तथा बीज उपचार-

 भिंडी मैं जब हम गर्मी के समय बीज बोते हैं। तो लगभग फरवरी-मार्च में बीज की बुवाई आवश्यक होता है। तथा बीज की मात्रा लगभग 5 से 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर भूमि पर करना चाहिए।

तथा जब हम बरसात के समय में भिंडी की बुवाई करते हैं। तो जून-जुलाई तक भिंडी की बुवाई हो जाना चाहिए। और यदि हम संकर बीजों का प्रयोग कर रहे हैं। तो 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज प्रयोग में लेना चाहिए ।

बीज उपचार के लिए हमें मेंकाजेब या कार्बेंडाजिम एक ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाक।र प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए ।बीज को इस घोल में लगभग 2 घंटे के लिए रख कर छोड़ देना चाहिए ।और छाया में सुखाकर हीबोना चाहिए।

इसके अलावा अगर हम लगातार भिंडी की फसल लेते रहना चाहते हैं। तो फरवरी-मार्च में 2 से 3 सप्ताह के अंतराल में हमें बीज की बुवाई अलग-अलग क्षेत्र में करते रहना चाहिए। इससे अलग अलग समय पर हमें फसल प्राप्त होती रहेगी।

· सिंचाई की व्यवस्था- भिंडी की फसल में अलग-अलग मौसम के लिए अलग-अलग सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए। गर्मी के समय अगर हम भिंडी की फसल ले रहे हैं। तो इस समय पर सिंचाई लगभग 6 से 7 दिनों के अंतराल में होती रहना चाहिए। तथा खेत में नमी बने रहना चाहिए।

वही बरसात के समय अगर हम सिंचाई करते हैं तो 15 से 20 दिन के अंतराल में बरसात ना होने की स्थिति में या बरसात कम होने की स्थिति में सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए। यदि यदि वर्षा होती है तो हमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। ध्यान रखने योग्य बात यह है। की जड़ों को सड़ने से बचाने के लिए खेत में पानी ना भर पाए ।इसलिए खेत में जल निकास की आवश्यकता होती है।

और खेत में नमी तो रहे परंतु जलभराव ना हो। इसकी व्यवस्था करना अति आवश्यक होता है। अतः इन सभी बातों को ध्यान में रखकर भिंडी की फसल में सिंचाई की व्यवस्था की जानी चाहिए।


· खाद एवं कीटनाशक दवाई का प्रयोग – 

भिंडी की फसल के लिए जो कीट लगते हैं। तथा उनसे जो रोग उत्पन्न होते हैं। उसका अगला टॉपिक रहेगा। जिसमें हमें कौन से कीटनाशकों का प्रयोग करना है। उसके बारे में संपूर्ण जानकारी दी जाएगी। अतः अगले टॉपिक में आप संपूर्ण कीटनाशकों के विषय में जानकारी ग्रहण कर पाएंगे।

भिंडी की फसल के लिए हमें गोबर की खाद जोकि डी कंपोस्ट की गई हो उसका छिड़काव 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अपने खेत में लेना चाहिए। यह संपूर्ण खाद मिट्टी में अच्छे से मिलवा कर जुताई करना चाहिए।क्योकि भिंडी का पौधा एक ऐसा पौधा होता है। जो बहुत से खेतों एवं बहुत खतरनाक मोजैक वायरस से लड़ने में सक्षम होता है। अतः इसके लिए रासायनिक खाद का प्रयोग कम से कम किया जाए तो ही अनुकूल होता है।

यदि भिंडी की फसल हमें लेते रहना है। तो मिट्टी की उपजाऊ क्षमता प्रभावित ना हो इसके लिए देसी खाद का ही प्रयोग करना आवश्यक होता है इसके साथ हम यूरिया का भी प्रयोग कर सकते हैं

इसी के साथ हमें नेत्र जन पोटाश एवं सल्फर का प्रयोग अपनी फसल के लिए अति आवश्यक होता है। जिसमें हमें नेत्र जन 100 किलोग्राम, सल्फर 50 किलोग्राम एवं, पोटाश 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाना आवश्यक होता है ।नेत्र जन की मात्रा में बुवाई के समय 50kg एवं बुवाई के 35 दिनों के बाद आधी मात्रा में देना चाहिए ।इसी के साथ हमें सल्फर एवं पोटाश की मात्रा 50 किलोग्राम की बुवाई के पूर्वमिट्टी में देना चाहिए।

· खरपतवार नियंत्रण –

भिंडी की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए हमेंहमारे खेतों में हाथ से गुड़ाई करवाकर तथा निंदाई करवाकर खरपतवार को नियंत्रित करना चाहिए। यह सबसे सुलभ तरीका होता है। भिंडी की फसल में खरपतवार को नियंत्रण करने का।

बीज बोने के 20 से 25 दिन पश्चात ही हमें निदा एवं गुड़ाई की सुविधा उपलब्ध करा देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए हम कीटनाशक दवाई के रूप मेंपेंडामैथिलीन50%ecले सकते हैं। जिसकी मात्रा हमें 1 लीटर प्रति 1 एकड़ की मात्रा से लेना है ढाई सौ से 300 लीटर पानी में हम इसका घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं।

बीज बुवाई के 2 दिन के अंतराल में ही हमें यह छिड़काव कर देना चाहिए। क्योंकि अगर हम बाद में इसका प्रयोग करते हैं। तो बीज अंकुरित होने पर यह पौधे को प्रभावित करेगा। और अगर हम बुवाई के एक-दो दिन में ही इसका छिड़काव कर देते हैं। तो खरपतवार में नियंत्रण होगा। साथ ही पौधे की अंकुरण क्षमता को भी यह प्रभावित नहीं करेगा।

उसके पश्चात हम हमारे खेत में यूरिया का छिड़काव करेंगे। जिससे हमारी फसल में ग्रोथ उत्पन्न हो जाए। और इसके पश्चात हाथ से गुड़ाई करवा कर हम खरपतवार नियंत्रण का कार्य कर सकते हैं।

· भिंडी की कटाई–

 भिंडी का पौधा जब अपना संपूर्ण आकार ग्रहण कर लेता है। तो उसमें से फल निकलना शुरू हो जाते हैं। एक पौधे से हम बहुत अधिक समय तक फल लेसकते हैं। जब फल पक कर तैयार हो जाता है ।या सब्जी जब तो कटने के लिए तैयार हो जाती है। तो भिंडी के देखने में फिंगर की आकृति के होते हैं ।तथा देखने में गहरा हरा रंग उन पर चढ़ा होता है।

तथा अगर हम यह देखना चाहते हैं। कि हमारे जो फल लग रहे हैं ।वह किस प्रकार के है ।मुलायम है या कठोर फल है। उसकी जांच के लिए हम पीछे से थोड़े से भाग को तोड़कर देख सकते हैं। अगर वह भाग बहुत आसानी से टूट जाता है। तो वह मुलायम है। तथा यदि वह आसानी से नहीं टूटता तो वह कठोर है।

मुलायम भिंडी जो होती है। वह स्वाद में भी बहुत स्वादिष्ट होती है। तथा बहुत कम समय में पक जाती है। परंतु जोभिंडीकठोर होती है। तो उसे पकने में बहुत समय लगता है। तथा स्वाद भी उसका अच्छा प्राप्त नहीं होता।

अंगले टॉपिक में आपको भिंडी की 3g और 4ग कटिंग के विषय में समुचित जानकारी अवश्य साझा करेंगे। आने वाले टॉपिक को जरूर पढ़ें तथा संबंधित और अधिक जानकारी के लिए हमें जरूर अपने विचार साझा करें।

अंत में –

आज का हमारा भिंडी की संपूर्ण जानकारी के विषय में रहा। आपको टॉपिक कैसा लगा हमें कमेंट करके कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ।तथा भिंडी के विषय में और अधिक जानकारी के लिए हमारी साइट पर विजिट करते रहें। खेती बाड़ी से संबंधित और अधिक जानकारी के लिए हमें आप अपने विचार साझा करते रहें।

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